भगवान की श्वांस और भक्तों का विश्वास है गीता – आज गीता जयंती पर विशेष

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भगवान की श्वांस और भक्तों का विश्वास है गीता – आज गीता जयंती पर विशेष

भुवन वर्मा बिलासपुर 14 दिसंबर 2021

अरविन्द तिवारीके कलम से

रायपुर – गीता जयंती प्रत्‍येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्‍लपक्ष की एकादशी को मनायी जाती है , इसे मोक्षदा एकादशी भी कहते हैं। दुनियाँ के किसी भी धर्म-संप्रदाय के ग्रंथों का जयंती नहीं मनाया जाता सिर्फ गीता जयंती ही मनायी जाती है। क्योंकि अन्य ग्रंथ इंसानों के द्वारा लिखे या संकलित किये गये हैं जबकि गीता का जन्म स्वयं भगवान के श्रीमुख से हुआ है। गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है। भगवद्गीता में कई विद्यायें बतायी गयी हैं। इनमें चार प्रमुख हैं- अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या। अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है। साम्य विद्या राग-द्वेष से मुक्ति दिलाती है। ईश्वर विद्या से व्यक्ति अहंकार से बचता है। ब्रह्म विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जागता है। गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है। यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिये नहीं अपितु संपूर्ण मानव जाति के लिये हैं। इसे स्वयं श्रीभगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर कहा है इसलिये इस ग्रंथ में कहीं भी श्रीकृष्ण उवाच शब्द नहीं आया है बल्कि श्रीभगवानुवाच का प्रयोग किया गया है। गीता का संदेश युगों पहले भी प्रासंगिक था, आज भी है और निरंतर भविष्य में भी प्रासंगिक बना रहेगा। गीता के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि गीता सर्वशास्त्रमयी , परम रहस्यमयी ग्रंथ के साथ साथ योग , ज्ञान , भक्ति की त्रिवेणी है। यह मनुष्य को जीवन के गहन सत्य से ज्ञान कराते हुये जीवन जीने का श्रेष्ठ मार्ग दिखलाती है। निराशा से, हताशा से और शंकाओं के अंधियारों से भरे मन को ज्ञान सूर्य से प्रकाशित करती है , इसका सान्निध्य मानव जीवन को नये समाधान प्रस्तुत करता है। हर धर्म का एक ग्रंथ होता है उसी तरह से हिंदू सनातन धर्म में गीता को पवित्र धर्मग्रंथ का स्थान दिया गया है। गीता भगवान कृष्ण के द्वारा महाभारत के युद्ध के समय किसी धर्म विशेष के लिये नहीं अपितु मनुष्य मात्र के लिये दिया गया उपदेश है जो हमें धैर्य , दु:ख , लोभ , अज्ञानता से बाहर निकलने के लिये प्रेरित करता है। गीता त्रियोग रजोगुण संपन्न ब्रह्मा से भक्ति योग, सतोगुण संपन्न विष्णु से कर्म योग और तमोगुण संपन्न शंकर से ज्ञान योग का ऐसा प्रकाश है, जिसकी आभा हर एक जीवात्मा को प्रकाशमान करती है। यह वेदों और उपनिषदों का सार, इहलोक और परलोक दोनों में मंगलमय मार्ग दिखाने वाला, कर्म – ज्ञान और भक्ति- तीनों मार्गों द्वारा मनुष्य के परम श्रेय के साधन का उपदेश करने वाला अद्भुत ग्रंथ है।

। भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है जिनमें चार प्रमुख हैं- अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या । माना गया है कि अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करता है , साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है। ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहंकार और गुदा के विकार से बचता है जबकि ब्रह्म विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जागता है। गीता माहात्म्य पर श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में कहा है कि अभिग्रह (जन्म-मरण) से मुक्ति के लिये गीता अकेले ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान होना माना गया है।

गीता सार पर पर चिंतन

क्यों व्यर्थ चिंता करते हो ? किससे व्यर्थ डरते हो ? कौन तुम्हें मार सकता है ? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है। जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।
तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो ? तुम क्या लाये थे ? जो तुमने खो दिया। जो लिया यहीं से लिया , जो दिया, यहीं पर दिया। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा।मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो। तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है।

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