गेहूं अनुसंधान परीक्षणों का उच्चस्तरीय निरीक्षण, वैज्ञानिकों ने सराहा कार्य
बिलासपुर। कृषि अनुसंधान एवं उन्नत किस्मों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए दिनांक 19 फरवरी 2026 को गेहूं की समन्वित तथा असमन्वित परीक्षणों का उच्चस्तरीय निरीक्षण किया गया। यह निरीक्षण दल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल द्वारा गठित वैज्ञानिकों के दल द्वारा किया गया था, जिसका उद्देश्य विभिन्न अनुसंधान परीक्षणों की प्रगति, वैज्ञानिक गुणवत्ता तथा तकनीकी उपयोगिता का मूल्यांकन करना था। निरीक्षण दल में वरिष्ठ वैज्ञानिकों की टीम शामिल रही, जिसमें डॉ. अनिल खिप्पल, प्रधान वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान), डॉ. अमित शर्मा, प्रधान वैज्ञानिक (आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन), डॉ. जे. बी. सिंह, प्रधान वैज्ञानिक (आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन), डॉ. के. के. मिश्रा, वैज्ञानिक (पादप रोग विज्ञान) तथा डॉ. डी. प्रशांत बाबू, वरिष्ठ वैज्ञानिक (आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन) शामिल थे।निरीक्षण के दौरान क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, सरकंडा, बिलासपुर में संचालित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना गेहूं एवं जौ के अंतर्गत विभिन्न उपचारों, उन्नत किस्मों, फसल प्रबंधन पद्धतियों तथा रोग एवं कीट प्रबंधन से संबंधित प्रयोगों का सूक्ष्म अवलोकन किया गया। वैज्ञानिकों ने खेत स्तर पर फसल की वृद्धि, पौधों की समानता, रोग प्रतिरोध क्षमता तथा विभिन्न कृषि प्रबंधन तकनीकों के प्रभाव का विस्तार से मूल्यांकन किया।
इस अवसर पर स्थानीय वैज्ञानिकों एवं परियोजना से जुड़े कार्मिक भी उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. संजय वर्मा, मुख्य वैज्ञानिक, डॉ. गीत शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, बिलासपुर, डॉ. दिनेश पांडेय, परियोजना अन्वेषक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान), डॉ. अवनीत कुमार, वैज्ञानिक (आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन) तथा तकनीकी सहायक माधुरी ग्रेस मिन्ज शामिल रहीं। निरीक्षण के दौरान दल के सदस्यों ने सभी उपचारों एवं परीक्षण खेतों का गहन अध्ययन किया तथा अनुसंधान कार्यों की वैज्ञानिक गुणवत्ता, प्रयोगों के रख-रखाव तथा आंकड़ा संधारण व्यवस्था की विशेष सराहना की। दल ने कहा कि बिलासपुर केंद्र पर संचालित अनुसंधान गतिविधियां क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप उन्नत एवं जलवायु सहनशील गेहूं किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। वैज्ञानिकों ने अनुसंधान कार्यों में अपनाई जा रही वैज्ञानिक पद्धतियों, फसल प्रबंधन तकनीकों तथा किसानों तक तकनीक हस्तांतरण के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी मॉडल के रूप में विकसित करने की संभावना व्यक्त की।
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