टिश्यू कल्चर से बांस की छोटी कली से तैयार होंगे हजारों पौधे

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ग्रामीण प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों ने टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला का किया शैक्षणिक भ्रमण

बिलासपुर। बांस अब केवल जंगलों तक सीमित वनस्पति नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण बहुउपयोगी फसल बनता जा रहा है। बांस की छोटी-सी कली अथवा उपयुक्त पौध ऊतक से प्रयोगशाला में बड़ी संख्या में गुणवत्तापूर्ण पौधे तैयार करने वाली पौध ऊतक संवर्धन (टिश्यू कल्चर) तकनीक इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इसी तकनीक को समझने के उद्देश्य से गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर के ग्रामीण प्रौद्योगिकी विभाग के बीएससी चतुर्थ वर्ष के विद्यार्थियों ने क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर की टिश्यू कल्चर प्रयोगशाला का शैक्षणिक भ्रमण किया। विद्यार्थियों ने बांस के पौध संवर्धन, प्ररोह बहुगुणन, जड़ निर्माण तथा नर्सरी में पौधों के अनुकूलन की विभिन्न अवस्थाओं को प्रत्यक्ष रूप से समझा।

छोटी कली से हजारों पौधों तक

विद्यार्थियों को बताया गया कि स्वस्थ एवं श्रेष्ठ मातृ पौधे से चयनित कलिका अथवा उपयुक्त ऊतक को प्रयोगशाला में निर्जीवीकरण के बाद पोषक माध्यम पर स्थापित किया जाता है। नियंत्रित वातावरण में विकसित प्ररोहों का बार-बार बहुगुणन कर बड़ी संख्या में पौध तैयार किए जा सकते हैं। इसके बाद पौधों को रूटिंग माध्यम में स्थानांतरित कर जड़ विकास कराया जाता है तथा हार्डनिंग और एक्लाइमेटाइजेशन के बाद उन्हें नर्सरी एवं खेत के लिए तैयार किया जाता है।

यह तकनीक सीमित मातृ पौध सामग्री से बड़ी संख्या में एकरूप और गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तैयार करने में उपयोगी हो सकती है। हालांकि पौधों की वास्तविक गुणवत्ता का मूल्यांकन नर्सरी और खेत स्तर पर उनके जीवित रहने, वृद्धि एवं प्रदर्शन के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

डॉ. वर्मा ने बताया बांस का रोजगार महत्व

क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. एस.के. वर्मा ने विद्यार्थियों को बांस की बहुउपयोगिता तथा इससे जुड़ी रोजगार और उद्यमिता की संभावनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बांस से निर्माण सामग्री, फर्नीचर, हस्तशिल्प और अनेक मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। गुणवत्तापूर्ण पौध उत्पादन, नर्सरी, रोपण, प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन को जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

वैज्ञानिक (वानिकी) अजीत विलियम्स ने विद्यार्थियों को बांस की वैज्ञानिक खेती, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तथा कृषि-वनीकरण में इसके उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बांस आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए प्रयोगशाला–नर्सरी–किसान–उद्योग के बीच तकनीकी एवं व्यावसायिक संबंध विकसित करना आवश्यक है।

प्रयोगशाला में कराया व्यावहारिक प्रदर्शन

प्रयोगशाला तकनीशियन सुनील खनूजा ने विद्यार्थियों को टिश्यू कल्चर की व्यावहारिक प्रक्रिया का प्रदर्शन कराया तथा संवर्धन माध्यम, पौध सामग्री के रख-रखाव, प्ररोह बहुगुणन और पौधों को अगली अवस्था में स्थानांतरित करने की जानकारी दी। भ्रमण की संरक्षक-सह-आचार्य डॉ. अलका मिश्रा रहीं, जबकि शोधार्थी शुभम पाठक ने भी विद्यार्थियों को प्रयोगशाला की विभिन्न गतिविधियों को समझने में सहयोग किया।

शैक्षणिक भ्रमण ने विद्यार्थियों को कक्षा के सैद्धांतिक ज्ञान से आगे बढ़कर आधुनिक पौध उत्पादन तकनीक का व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने समझा कि टिश्यू कल्चर जैसी आधुनिक तकनीक को बांस की वैज्ञानिक खेती, कृषि-वनीकरण और उद्यमिता से जोड़कर गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री के साथ ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

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