मूर्तिपूजा की शास्त्रीय मर्यादा — पुरी शंकराचार्य

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मूर्तिपूजा की शास्त्रीय मर्यादा — पुरी शंकराचार्य

अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट

जगन्नाथपुरी — ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरू शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वती जी महाराज जी मूर्तिपूजा की शास्त्रीय विधा के संबंध में कहते हैं कि मूर्ति पूजा एक दर्शन है ,विज्ञान है उसकी परिधि में , जैसे जल, स्थल, नभ में सब जगह विद्युत विद्यमान है लेकिन बिजली को पावर हाऊस के माध्यम से विशेष विधा से व्यक्त करते हैं , तो गुड कन्डक्ट ,बैड कन्डक्ट बिजली का उपयोग कैसे करें कैसे ना करें ,उपयोग करके लाभान्वित हों ,हानि के चपेट से बचें वो सब मर्यादा आपको माननी पड़ेगी या नहीं ? धर्म एक ऐसी चीज़ है अतिरिक्त अधिक काम कर्मकाण्ड में मान लिया अधिक सामग्री दे दी तो फल नहीं मिलेगा , कम सामग्री हो गई तो फल नहीं मिलेगा । गणित के समान है , न्यूनता से अधिकता से दोनों से बचाया जाता है तब धर्म की निष्पत्ति होती है। जिस देवता को तुलसी नहीं चढ़ाना चाहिये , उस देवता को आप तुलसी चढ़ा देंगें गणेश जी को तब ? तो एक ही सनातन धर्म में भी किसको हम तुलसी चढ़ावें किसको ना चढ़ावें ये सब किसको अमुक चीज़ चढ़ावें किसको ना चढ़ावें , कब पूजन करें कब ना करें , किस दशा में करें किस दशा में ना करें , कौन करे कौन ना करे , कब करे कब ना करे , कहां करें कहां ना करें ये सब व्यवस्थ‍ा जो है बहुत संतुलित है । पुजारी होने से ही व्यक्ति का कल्याण हो जाता ये तो नहीं है । पुजारी होने पर पूजा का अर्य ना हो। अर्य मने दुश्मन ना हो तब सद्गति होगी नहीं तो पुजारी पूजा का दुश्मन बन गया । भगवान को निवेदित करने योग्य सामग्री का उपभोक्ता बन गया , बिना निवेदन किये य‍ा प्रसाद का बिना वितरण किये सारा प्रसाद खा गया तो पाप भी लग सकता है । भगवान की पूजा है , कुछ भी है , हमने एक संकेत किया कि मूर्ति पूजा , मूर्ति में देवत्व है यह किस प्रमाण से जाना आंख से तो नहीं जाना, शास्त्र के द्वारा उस देवत्व को व्यक्त करने की विधा शास्त्र के द्वारा । देवत्व बना रहे मूर्ति में देवत्व लुप्त ना हो जाये और ग्रह, भूत , पिशाच , उपद्रवी शक्ति मूर्ति में घुस ना जाये इन सब का विज्ञान कहांँ हैं ? इन सब का विज्ञान तो शास्त्र सम्मत है इसलिये अगर मूर्ति की बात कही गई है सनातन धर्म की विधा से तो उसके पूजन कि पद्धति भी सनातन धर्म की विधा से होनी चाहिये।

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