दस दिवसीय लोक वाद्य कला शिविर का सफल आयोजन

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भिलाई।संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से कुहुकी कलाग्राम संग्रहालय परिसर, मैत्रीबाग चौक, मरोदा सेक्टर में दस दिवसीय छत्तीसगढ़ स्तरीय लोकवाद्य कार्यशाला शिविर का शानदार समापन हुआ।जिसका आयोजन राजपथ पर गणतंत्र दिवस समारोह में दस से अधिक बार छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक कलाकार तथा प्रख्यात लोकवाद्य संग्रहक व लोकरागिनी लोकमंच के संचालक रिखी क्षत्रिय द्वारा किया गया।

जहां पहुंचते ही जून की उमस भरी दुपहरी के तेज धूप के कहर से झुलसे मन का स्वागत एक अलग ही मौसम कर रहा था। कला ग्राम में प्रवेश करते ही घने पेड़ों के बीच कोयल की कुक सी गूंज रही थी। भीतर कुहुकी कलाग्राम में छत्तीसगढ़ के अलग अलग क्षेत्रों से आए कलाकार अपने अपने वाद्य यंत्रों से सम्मोहित कर देने वाली स्वर लहरियां बजा रहे थे । वे आगंतुकों को अपनी कलाकृतियों का निर्माण करके दिखा रहे थे साथ ही अन्य कलाकारों से उनके वाद्य यंत्रों को बनाना भी सीख रहे थे। कहीं कहीं कुछ कलाकार आपस में ही इन वाद्य यंत्रों के निर्माण से जुड़ी चर्चाओं में भी मशगूल भी थे। इनमें से अधिकतर वाद्य यंत्र अलग अलग प्रकार की लकड़ियों से बनाए जा रहे थे, इसके अलावा कोई वाद्य यंत्र बेलमेटल से, कोई लोहशिल्प से तो कोई बांस से, कोई मिट्टी से तो कहीं भट्ठी में में ढोकरा शिल्प में ढालकर कुछ वाद्य यंत्रों को पकाया जा रहा था।

किसी वाद्य यंत्र में घोड़े के पुंछ के बालों को प्रयोग किया जाता है तो किसी में गोह या अन्य किसी जानवर के खालों का और इनकी उपलब्धता न होने पर अन्य विकल्प स्वरलहरियों के माधुर्य में कितना अंतर ला देता है। यह उनके मध्य चर्चा का रोचक विषय था। शिविर में कला एवं संगीत प्रेमी दर्शकों तथा स्कूली बच्चों को अनेक लुप्तप्राय वाद्ययंत्र चिकारा , खंजेरी,तम्बूरा, गतका,तुरही,चरहे, चिटकुली ,कुहूकी और रुँजू आदि वाद्ययंत्र बजाकर तथा बनाकर दिखाया जा रहा था। नई पीढ़ी को छत्तीसगढ़ के समृद्ध लोक संस्कृति से अवगत कराने वर्ष 2003 से लगातार हर साल दस दिवसीय शिविर का आयोजन यहां किया जा रहा है। जिसमें प्रतिवर्ष दूरस्थल अंचल से कलाकार आकर लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रों के विषय में लोगों को जानकारी देते हैं। इस आयोजन से लुप्तप्राय वाद्यों को पुनर्जीवन तथा शिल्पकारों को बाजार मिलता है।

समापन समारोह में आयोजक रिखी क्षत्रीय,वरिष्ठ मंच संचालिका अन्नपूर्णा क्षत्रीय मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार व लोककलाकार विजय दिल्लीवार अन्य अतिथि वरिष्ठ लोककलाकार गणेश विश्वकर्मा, तथा साहित्यकार मेनका वर्मा द्वारा सभी कलाकारों का सम्मान किया गया। इस अवसर पर अनेक गायक वादक व प्रसिद्ध लोक कलाकार भी उपस्थित थे। रुँजू वादक नंद कुमार देवार द्वारा दसमत कैना गाथा गायन तथा मनहरण दास बंजारे द्वारा अपने नानाजी के ढाई सौ साल पुराने चिकारे से मंच पर जब प्राचीन कायाखंडी भजनों की प्रस्तुति दी गई दर्शक वाह वाह करते हुए एक अलग ही आनंद में खो गए। इस साल शिविर में आकर्षण का केंद्र रहे गाड़ाडीह के रुंझू बनाने और बजाकर गाथा गायन करने वाले देवार कलाकार नंदकुमार देवार(लेड़गा) तथा कोलिहापुरी के चिकारा बनाने और बजाकर कायाखंडी निर्गुण भजन गाने वाले कलाकार मनहरण दास बंजारे ये दोनों ही अपनी अपनी विधाओं में पारंगत अपनी पीढ़ी के अंतिम कलाकार हैं। इसके साथ ही शिविर में दहीकोंगा, कोंडागांव के शीबू कश्यप ने बेलमेटल तुरही,रामदास ने लौह शिल्प,मरार पारा कोंडागांव के डमरू चक्रधारी ने मिट्टी शिल्प ,राजनांदगांव के पन्नालाल लोहारा के दीपक तारम व बिजेलाल ने काष्ठ कला ,गाडाडीह के डोरे लाल रन चिरई के रामकुमार पाटिल ने तम्बूरा बनाकर प्रदर्शित किया। जिसे देख सुन कर अनेक कलाकारों, संगीत प्रेमीयों तथा स्कूल के विद्यार्थीयों की भीड़ अचंभित व आनंदित होती रही। अतिथियों ने कार्यकम के आयोजन तथा कलाकारों की सराहना की और ऐसे आयोजनों को महत्वपूर्ण बताया।

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