सत्ता की भूख और विवेकहीन दखलंदाज:सिद्धारमैया – डीके शिवकुमार का अनकही पावर-शेयरिंग फॉर्मूला

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आलेख- राजेश अग्रवाल बिलासपुर

कर्नाटक में 2023 की जीत के बाद सिद्धारमैया, जिन्हें AHINDA वोट बैंक का चेहरा माना जाता है और डीके शिवकुमार (पार्टी के संगठनात्मक चेहरा और वोकलिग्गा नेता) के बीच अनकही पावर-शेयरिंग फॉर्मूला बना था। सिद्धारमैया ने पूरा कार्यकाल पूरा करने की जिद की, जबकि शिवकुमार गुट 2.5 साल बाद अपनी बारी मांगता रहा। आखिरकार सिद्धारमैया को इस्तीफा देना पड़ा और शिवकुमार CM बनने जा रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में पार्टी हाईकमान को बार-बार दखल देना पड़ा, मीटिंग्स हुईं, लेकिन राज्य की प्रशासनिक मशीनरी लगभग लकवाग्रस्त रही। कल्याणकारी योजनाओं के बिल अटके, विकास कार्य ठप पड़े और आंतरिक कलह ने जनता के मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया।
छत्तीसगढ़ में 2018-2023 के दौरान ऐसा ही कुछ हुआ था। भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच तीखी तकरार चली।सिंहदेव गुट रोटेशनल CM फॉर्मूले की मांग करता रहा, जिसे बघेल गुट ने हमेशा खारिज किया। हाईकमान ने 2023 चुनाव से कुछ महीने पहले सिंहदेव को डिप्टी CM बनाकर सुलझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा यह हुआ कि पार्टी की छवि बिगड़ी और 2023 में कांग्रेस की हार हुई।
एक समान पैटर्न दिखता है। कांग्रेस में लोकतांत्रिक तरीके से नेतृत्व चयन की बजाय हाईकमान की मनमानी और गुटबाजी हावी रहती है। जब भी कोई सक्षम नेता अपनी पकड़ मजबूत करता है, तो दूसरे गुट को खड़ा करके बैलेंस करने की कोशिश की जाती है। नतीजतन, मुख्यमंत्री सत्ता संभालने के बजाय दिल्ली दरबार की तरफ ज्यादा ध्यान देते हैं। यह मैनेजमेंट वाली राजनीति लगन से काम करने वाले आम कार्यकर्ताओं में घोर असंतोष पैदा करता है।
कांग्रेस का यह तौर तरीका पार्टी को लगातार नुकसान पहुंचा रही है। राजस्थान में गहलोत-पायलट का विवाद, मध्य प्रदेश में सिंधिया-कमलनाथ के बीच सत्ता संघर्ष इसी तरह के नमूने हैं। हाईकमान, चाहे उसे राहुल संभाल रहे हों, खड़गे तय कर रहे हों या प्रियंका गांधी की चल रही हो- उनको ऐसी कहानी बंद करनी होगी। BJP में एक स्पष्ट कमांड स्ट्रक्चर है, कांग्रेस में एक ही परिवार की तीन दिशाएं हैं। हर कोई हस्तक्षेप करता है।
कांग्रेस अगर खुद को बचाना चाहती है तो हाईकमान को समझना होगा कि सत्ता का बंटवारा और बार-बार हस्तक्षेप समाधान नहीं, समस्या है।

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