क्या हमारे देश मे सिर्फ पुल हीं गिर रहे हैं…..? नही…. सबसे पहले नेता गिरते हैं, फिर अधिकारी, उसके बाद इंजीनियर इन तीनों के गिरने के बाद ठेकेदार भी गिर जाता है फिसलकर
भुवन वर्मा बिलासपुर 10 जुलाई 2024
बिलासपुर।मानवता और इंसानियत बेच खाये हैं ठेकेदार इंजीनियर प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि इसी का जीता जागता उदाहरण है कि आजकल हमारी नदियों पर बनी हुई पूल धड़ाधड़ गिर रही है। इधर बिहार में आजकल धड़ाधड़ पुल गिर रहे हैं। यूट्यूब, चैनल वाले पत्रकार एक पुल के गिरने पर वीडियो बनाते हैं तब तक दूसरा गिर जाता है। वे दूसरे तक पहुँचते हैं तबतक तीसरा गिर जाता है। लगता है पुल और युट्यूबर्स में दौड़ लगी है, कि कौन आगे है।
पुल गिरने की खबर हम इतनी बार सुन चुके हैं कि अब कुछ भी गिरता है तो लगता है कि कोई पुल हीं गिरा है। हालाँकि गिरने के लिए तो एयरपोर्ट की छत भी गिर रही है, सूट बूट वाले बाबा के चरणों में उनके भक्त गिर रहे हैं, फेसबुक पर देशवादियों की रीच गिर रही है पर इन सब के बावजूद चर्चा केवल बिहार के पुल पा रहे हैं। इसे बिहार का सौभाग्य मानना चाहिए।
एक आम भारतीय होने के नाते हम जानते हैं कि कोई पुल एक झटके में नहीं गिरता। गिरने की प्रक्रिया बहुत पहले से चल रही होती है। सबसे पहले नेता गिरते हैं, फिर अधिकारी गिरते हैं, उसके बाद इंजीनियर गिरता है। इन तीनों के गिरने से फिसलन हो जाती है सो ठेकेदार भी गिर जाता है।
बात यहीं नहीं रुकती, इस फिसलन को देख कर आम जनता भी खुद को रोक नहीं पाती, देखा-देखी वह भी गिरने लगती है। आपने यदि ठेकेदार के स्टॉक से गिट्टी, बालू, मसाला चुराती जनता को शायद देखा हो… अब जनाब जब इतने लोग गिर जाते हैं तो पुल को भी अपने खड़े होने पर शर्म आने लगती है। तब अपने निर्माताओं का साथ देने के लिए वह भी गिर जाता है। बात खत्म !
सच कहूँ तो हमारे देश में गिरना कभी लज्जा का विषय नहीं रहा। व्यक्ति जितना गिरता है, उसकी प्रतिष्ठा उतनी हीं बढ़ती जाती है।
पुल गिरने के कई लाभ भी हैं। इसका अर्थशास्त्र यह है कि जब पुल गिरेगा, तभी न दुबारा बनेगा। दुबारा बनेगा तो मजदूरों को काम मिलेगा। सीमेंट, बालू, सरिया के रोजगारियों का धंधा चलेगा। नेता, अधिकारी कमीशन खाएंगे तो पैसा मार्किट में हीं न देंगे ! इस तरह पैसा घूम फिर कर जनता तक हीं जायेगा, सो पुलों का गिरना जनता के लिए लाभदायक है।
एक बात और है ! यह तो नदियों के दोनों तटों को जोड़ने वाले पुल हैं दोस्त ! हमारे यहाँ तो आदमी को आदमी से जोड़ने वाले पुल कब के ढह गए हैं। हम जब उसपर दु:खी नहीं हुए तो इसपर क्या हीं होंगे। है न ?
यह एक संकलित एवं संपादित पोस्ट है !
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