माँ का कालरात्रि स्वरूप और शुंभ-निशुंभ वध से गूंजी न्यायधानी: पीताम्बरा पीठ में सातवें दिन उमड़ा आस्था का सैलाब
बिलासपुर।न्यायधानी बिलासपुर के सरकण्डा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में चल रहे चैत्र वासंतिक नवरात्र के पावन उपलक्ष्य में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ अपने सातवें सोपान में अत्यंत दिव्य और ऊर्जावान रहा। पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज के संरक्षण में चल रहे इस अनुष्ठान में आज सुप्रसिद्ध कथावाचक आचार्य श्री मुरारीलाल त्रिपाठी ‘राजपुरोहित’ ने माँ कालरात्रि के स्वरूप, चण्ड-मुण्ड और शुंभ-निशुंभ वध के प्रसंगों का सविस्तार वर्णन किया।

सातवें सोपान का सार: अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा
कथा की शुरुआत मंगलाचरण और पीठाधीश्वर के दिव्य सानिध्य में हुई। आचार्य श्री मुरारीलाल त्रिपाठी ने व्यासपीठ से उद्घोष किया कि सप्तम सोपान ‘कालरात्रि’ का है। यह वह शक्ति है जो काल का भी भक्षण कर लेती है।
माँ कालरात्रि का प्राकट्य और स्वरूप
आचार्य श्री ने बताया कि जब राक्षसों का उत्पात अत्यधिक बढ़ गया, तब भगवती ने अपने तेज से अत्यंत विकराल रूप धारण किया। माँ का वर्ण अंधकार के समान काला है, बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की माला है। यह स्वरूप देखने में भयानक अवश्य है, परंतु भक्तों के लिए अत्यंत शुभकारी है, इसीलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। “माँ कालरात्रि भक्त के भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करती हैं। उनकी उपासना से साधक का भय समाप्त हो जाता है और वह परम निर्भयता को प्राप्त करता है।”
चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज वध का दार्शनिक विवेचन
आज की कथा का मुख्य केंद्र रक्तबीज वध का प्रसंग रहा। आचार्य जी ने बड़े ही ओजस्वी ढंग से वर्णन किया कि कैसे रक्तबीज की हर एक बूंद से नए राक्षस पैदा हो रहे थे, तब माँ काली ने अपने खप्पर में उसका रक्त पान कर अधर्म को समूल नष्ट किया। उन्होंने इसे आज के मनुष्य के ‘विकारों’ से जोड़ते हुए कहा कि “एक बुराई (रक्त की बूंद) जब धरती पर गिरती है, तो वह कई नई बुराइयों को जन्म देती है। क्रोध और लोभ ऐसे ही रक्तबीज हैं। इनका अंत केवल शक्ति की शरणागति से ही संभव है।”
शुंभ-निशुंभ का अहंकार और नारी शक्ति का विजय
शुंभ और निशुंभ के वध के प्रसंग के माध्यम से आचार्य जी ने समाज को नारी शक्ति के महत्व का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवती ने देवताओं को वरदान दिया था कि वे स्वयं ही संहार करेंगी। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि शक्ति किसी की मोहताज नहीं होती, वह स्वयं सिद्ध है।
पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज का आशीर्वचन प्रवचन के मध्य में पीठाधीश्वर आचार्य डॉ. दिनेश जी महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि “श्रीमद् देवी भागवत का सातवां दिन ‘विवेक और वैराग्य’ का संगम है। शुंभ और निशुंभ मात्र राक्षस नहीं थे, वे ‘ममत्व’ और ‘अहंकार’ के प्रतीक थे। जब तक मनुष्य के भीतर से ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव समाप्त नहीं होगा, तब तक उसे परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हो सकता। शक्ति की उपासना हमें विनम्र बनाती है, अहंकारी नहीं।” उन्होंने आगे कहा कि “बिलासपुर की इस पावन धरा पर माँ पीताम्बरा की कृपा बरस रही है। यह कथा केवल श्रवण मात्र नहीं है, बल्कि यह अपने अंतर्मन को शुद्ध करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।” सप्तम दिवस की कथा में श्रद्धालुओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। मंदिर परिसर ‘जय माता दी’ और ‘जय पीताम्बरा माई’ के जयकारों से गुंजायमान रहा।
भवदीय,
(ब्रह्मचारी मधुसूदन पाण्डेय)व्यवस्थापक, श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर, सुभाष चौक, सरकण्डा, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
About The Author



I’m often to blogging and i really appreciate your content. The article has actually peaks my interest. I’m going to bookmark your web site and maintain checking for brand spanking new information.