संघर्षगाथा; अंधेरे से उजाले तक : हौसले की उड़ान बनी पहचान

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गर उम्मीद जिंदा हो, तो रास्ते मिल ही जाते हैं।
खुद को कमजोर समझने वाले ही ठोकरें खाते हैं।।

रायपुर।पिता शकील अहमद और मां मेरुन्निशा की पहली संतान के रूप में 2003 में मेरा जन्म हुआ । जन्म के बाद से ही मेरे आंखों की नसें सूखने लगी थी। रायपुर से हैदराबाद तक मेरे माता पिता मुझे लेकर अस्पताल दर अस्पताल बड़ी उम्मीद से लगातार सालों साल भागते रहे पर कहीं से भी कोई राहत नहीं मिली और अंधेरा मेरी किस्मत बनकर मेरी आंखों में ही बस गया। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के गोल बाजार में अमजद भाई गिलेट वाले के नाम से हमारा पारंपरिक और आर्टिफिशल ज्वेलरी का छोटा सा पुस्तैनी कारोबार है । जो दादाजी के बाद अब पिताजी संभालते हैं उसी से हमारा घर चलता है। मां गृहिणी हैं।अपने छोटे से बिजनेस के बावजूद भी पिताजी ने हमें बहुत लाड़ प्यार से पाला और हमारी सारी जरूरतें पूरी की। मठपुरैना अंध विद्यालय से मैने बारहवीं तक शिक्षा प्राप्त थी। प्रथम श्रेणी में 70%अंक पाने पर मुझे स्कॉलरशिप मिली और काली बाड़ी गर्ल्स स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। भीड़ भरी सड़कों पर ठिठक -ठिठककर अपने लिए रास्ता बनाते हुए मैने अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। अब मैं आर्थिक रूप से भी आत्म निर्भर बनना चाहती थी। बी. ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं रेलवे ग्रुप बी की नौकरी के सपने देखने लगी तथा आवेदन फॉर्म भर देने के बाद परीक्षा की तैयारी करने लगी थी। इसी दौरान मुझे पता चला कि मेरे सारे सर्टिफिकेट जो मेरी पूंजी थे । उन सभी में मेरे सरनेम अलग अलग लिखे गए हैं और इस गलती को सुधरवाने ,आधार कार्ड में भी मैने सुधार करवाया जिसकी तीन से चार बार की एक सीमा होती है इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। जो अनजाने ही पार हो गई। मैं बहुत परेशान हुई। बहुत भागदौड़ करके पता चला कि हैदराबाद में आधार कार्ड के मुख्य ऑफिस में कुछ हो सुधार सकता है,जिसकी केवल पांच से दस प्रतिशत चांस है। मेरे लिए ये बड़ी राहत की बात थी। मैंने अपने स्कॉलर शिप में मिला पैसा लगाया और खुद ही साल भर कोर्ट कचहरी में वकील और जजों से मिलने बहुत मशक्कत की । संतोषी नगर से घड़ी चौक तक की व्यस्ततम सड़क पर अकेले आना – जाना मेरे लिए आसान नहीं था। सारे दस्तावेज बनवाकर हैदराबाद कुरियर करवाए एक महीने बाद रिस्पॉन्स आयेगा कहा गया। पर जब नहीं आया तब मैने कॉल किया, पता चला कि मेरा आवेदन रिजेक्ट हो गया है ,मतलब मेरे बीस हजार रूपए और साल भर की मेहनत सब बेकार हो गए । मेरे सारे स्कूली डॉक्यूमेंट्स अब मेरे किसी काम नहीं आ सकते थे। मेरे पांव के नीचे से जमीन खिसक गई। सपने टूटना दिल टूटने से बहुत बड़ा और दर्दनाक है। यह मैने अब जाना , मैं हताश हो गई और निराश होकर डिप्रेशन में जाने लगी। हम केवल दो बहनें हैं कहां तो मैं अपने पेरेंट्स का सहारा और छोटी बहन के लिए प्रेरणा बनने के सपने देख रही थी और अब इस स्थिति में खुद को बेबस पा रही थी ।

आंखों में तो पहले ही अंधेरा था अब सब कुछ हाथ से छूटता महसूस होने लगा। मेरे पास दो ही रास्ते थे। पहला कि एक ही बार में सब परेशानी खत्म कर लूं और दूसरा कि जीने के लिए रोज रोज जीवन से लड़ूं। दूसरा रास्ता चुनते हुए मैने खुद को एक आस बंधाया और खुद को फिर से ऊपर उठाने का प्रयत्न किया। इसी दौरान एक सीनियर का कॉल आया क्या तुम्हे नौकरी चाहिए। आठ से दस हजार की नौकरी थी। जिसकी मुझे बहुत जरूरत थी। उस समय किसी को मुझ पर और इस बात पर विश्वास नहीं था कि कोई मुझे पांच हजार की नौकरी भी कभी देगा। इधर अपनी कमी की वजह से मुझमें आत्मविश्वास की बहुत कमी थी मै लोगों से बात करने से बचती थी। पर फिर भी हिम्मत बटोर कर मैं नौकरी के इंटरव्यू के लिए गई। आभा चावला मैडम ने मेरा इंटरव्यू लिया और सलेक्ट होने पर मुझे ऑनलाइन और ऑफलाइन ट्रेनिंग के बारे में विस्तार से बताया। अपने स्वभाव के अनुसार मैने ऑनलाइन ही चुना। उन्होंने कहा एक बार मेरे कहने पर ऑफलाइन क्लास में जाओ । वहां वी फैमिली के हेड बॉस डॉक्टर संतोष पांडे सर की क्लास थी । मैं पहली लाइन में बैठी थी इस दौरान मेरी आंख लगातार हिलते देख उन्होंने ट्रेनिंग के बीच में ही मुझसे इस विषय में पूछा। मैने अपनी आंखो की समस्या उन्हें बताई तो उन्होंने मुझे लगभग डांटते हुए कहा तुम्हें कोई समस्या नहीं है यह सब दिमाग का खेल है। यह पहली बार था जब किसी ने मुझे सामान्य होने का अहसास दिलाया था वरना मेरी कमी मेरे लिए बेचारगी का ही सबब बन जाती थी। मुझे बहुत अच्छा लगा। एक नई ऊर्जा मैने अपने अंदर महसूस किया कि मै भी सामान्य हूं। पांच सात दिनों की इस ट्रेनिंग के बाद मुझे जॉब और बिजनेस के बारे में विस्तार से बताया गया।मैने बिजनेस चुना।सीनियर मेंटर मयंक साहू सर ने मुझे तीन चार महीने की ट्रेनिंग दी और मुझमें ऐसा बदलाव आया कि मैं जो नहीं कर सकती कहती, उसी में मुझे एक्सपर्ट बना दिया गया। वी फैमिली से जुड़ना मेरे जीवन का नया अध्याय बन गया। डॉ. संतोष कुमार पांडे सर, मयंक साहू सर और वी फैमिली के इस प्लेटफॉर्म ने मेरी जिंदगी और मेरी सोच के साथ ही मेरा पूरा व्यक्तित्व बदल दिया।अब मेरा ड्रेसिंग सेंस मेरे बातचीत का तरीका देखकर कोई मेरी दृष्टिबाधित होने का अंदाज भी नहीं लगा सकता। मैं लोगों की मेंटल फिजिकल हेल्थ वेल्थ,जॉब आदि की समस्याओं के निराकरण का प्रयास करती हूं । अनेकों लोगों ने इसका लाभ लिया है और अपनी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर शेयर किया है।शुरूआती तीन महीने में ही मेरी एक से डेढ़ लाख की अर्निंग हुई है। मैं सामान्य जनों के साथ- साथ दिव्यागजनों के हितार्थ भी काम करती हूं। इसके अलावा मैंने ब्यूटीपार्लर का भी कोर्स किया है जिसका उपयोग मैं परिवार में और अपने लिए तथा प्रोफेशनल के तौर पर भी करती हूं।अपनी कमियों को स्वीकार कर अपनी ऊर्जा शक्ति आजमाकर देखिए आपके सपनों की ऊंची उड़ान के लिए पूरा आसमान खुला है, दृष्टिबाधित दिव्यांगता की चुनौती से लड़कर एक सफल महिला उद्यमी बनने तक का आपका सफर औरों के लिए भी उदाहरण और अनुकरणीय है।आप हमारी शुभकामनाएं लिए सफलताओं के शीर्ष पर पहुंचे ।

आरजू खान
दृष्टिबाधित वेलनेस कोच, महिला उद्यमी
रायपुर (छ.ग.)
मोबा.न.-7389300311

 

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