आइए जानते हैं छत्तीसगढ़ में किस प्रकार मनाया जाता है आठे कन्हैया : छत्तीसगढ़ की विलुप्त होती आठे कन्हैया भित्ति चित्रकला

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आठे कन्हैया तिहार (कृष्ण जन्माष्टमी)

दुर्ग।आठे कन्हैया भादो महीने के कृष्ण पक्ष में अष्टमी को मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में भी आठे कन्हैया /कृष्ण जन्माष्टमी बड़े धूमधाम से मनाई जाती है, छत्तीसगढ़ की सभी जनसमुदाय द्वारा भगवान श्री कृष्ण का उपवास किया जाता है। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं व युवाजवान सभी मिलजुल कर इस पर्व को बड़े विधि-विधान से मनाते हैं। भगवान श्री कृष्ण का जन्मउत्सव, छत्तीसगढ़ में बड़ी आस्था और विश्वास के साथ जुड़ी हुई है ,आज के दिन छत्तीसगढ़ के निवासी ,भेंगरा की पत्ती ,सेम की पत्ती व चूड़ी रंग से, आठे कन्हैया का भित्ति चित्रण कर पूजन किया जाता है ।घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं ,जैसे पूड़ी,सूजी व सिंघाड़े का कतरा व विभिन्न प्रकार के नमकीन बनाये जाते है। रात्रि कालीन चित्रित किये भगवान आठेकन्हैया का पूजन कर ,भगवान आठे कन्हैया को दूध ,दही व विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। एक दूसरे के घरों में प्रसाद बांटे जाते हैं ,बच्चों व युवा वर्गो द्वारा दही हांडी फोड़ने का भी कार्यक्रम रखा जाता है।

आठेकन्हैया पर्व की मान्यता व विलुप्त होती आठे कन्हैया भित्तिचित्रण

छत्तीसगढ़ में भगवान श्री कृष्ण,बलराम व कंस द्वारा मारे गए ,छः मृत भाइयों का भी पूजन करने का, विधान हमारे छत्तीसगढ़ में है । प्राचीन समय में, गाँव के घरों में भगवान के तस्वीर व मूर्ति बहुत कम होते थे। अतः गांव में लोग अपने घरों में,आठे कन्हैया पर्व के दिन, भेंगरा पत्ती, जिसको भृंगराज कहते है, व सेम की पत्ती व चूड़ी रंग से, भगवान श्रीकृष्ण ,बलराम व भगवान श्री कृष्ण के छः मृत भाइयों का भित्तिचित्रण , पूजा घर के दीवारों में करते है। इस भित्तिचित्रण में,भगवान श्री कृष्ण व साथ मे उनके भाईयो को नाव चलाते व नाव में बैठे दिखाया जाता है, भगवान श्री कृष्ण, बलराम और उनके छः मृत भाईयों का चित्रण, बनाने के कारण, इसे आठे कन्हैया भित्ति चित्रण व आठे कन्हैया तिहार कहतें है । परंतु वर्तमान समय में लोग भगवान श्री कृष्ण के तस्वीर व मूर्ति का ही पूजन करते है,लोग प्रायः आठे कन्हैया का चित्रण नहीं करते, जोकि छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति से जुड़ी हुई है। जो कि छत्तीसगढ़ की अति प्राचीन भित्ति चित्रकला है ,जो समय के साथ धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रही है।

लेखक:-अभिषेक सपन
युवा मटपरई शिल्पकार
ग्राम:-डुमरडीह
जिला:-दुर्ग(छत्तीसगढ़)

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