शक्ति की आराधना: शक्ति, माया और मन का रहस्य, पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉक्टर दिनेश जी महाराज
नवमी के अवसर पर कन्या पूजन भंडारा एवं रात्रिकालीन हवन
बिलासपुर के सुभाष चौक, सरकंडा स्थित श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर में शारदीय नवरात्र महोत्सव पूरी भव्यता, श्रद्धा और वैदिक परंपराओं के साथ मनाया जा रहा है। महोत्सव के अंतर्गत प्रतिदिन माँ भगवती की आराधना, श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक, और महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती देवी का श्रीसूक्त षोडश मंत्र द्वारा दूधधारियापूर्वक अभिषेक किया जा रहा है।
शारदीय नवरात्र के इस पावन पर्व मे नवमी के पावन पर्व पर प्रातः 10:00 बजे से दोपहर 1:00 तक कन्या पूजन, भंडारा तथा रात्रिकालीन हवन का आयोजन किया जाएगा।
नवमी तिथि नवरात्र की पूर्णता का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर त्रैलोक्य को उसके आतंक से मुक्त किया था, इसलिए इसे ‘महिषासुरमर्दिनी दिवस’ या ‘विजया’ के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्र के नौ दिन की कठिन साधना, उपवास, जप और ध्यान का समापन महानवमी के हवन के साथ होता है। यह दिन साधक के लिए अपनी ऊर्जा को केंद्रित कर भगवती चरणों में समर्पित करने का सर्वोच्च अवसर है।
पीतांबरा पीठाधीश्वर आचार्य डॉक्टर दिनेश जी महाराज ने बताया कि नवरात्र में जिस शक्ति (आदि पराशक्ति) की आराधना की जाती है, वह केवल कोई बाहरी भौतिक बल नहीं है, बल्कि इस संपूर्ण चराचर जगत की मूल चेतना है। जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी लीला से आच्छादित किए हुए है, वही माया है। माया कोई भ्रम मात्र नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो ईश्वर और जीव के बीच कार्य करती है। जब यह माया अज्ञान से जुड़ती है, तो बंधन का कारण बनती है; और जब यही माया भगवती की कृपा से ज्ञान और भक्ति का रूप लेती है, तो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। हमारे भीतर जो चंचल मन है, वह भी उसी महाशक्ति का एक सूक्ष्म विस्तार है। जब मन विषयों की ओर भागता है, तो वह बंधनकारी माया बन जाता है,और जब वही मन एकाग्र होकर माँ के चरणों में टिक जाता है, तो वह ‘भक्ति’ और ‘योग’ बन जाता है। नवरात्र इसी चंचल मन को अनुशासित करने और उसे अंतर्मुखी बनाने की एक वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
भवदीया,
डॉ. अमिता दीपेश पाण्डेय
मीडिया प्रभारी
श्री पीताम्बरा पीठ त्रिदेव मंदिर,
सुभाष चौक, सरकंडा, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
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