तबादला आदेश में सांसदों-मंत्रियों की अनुशंसा बेअसर! सामान्य प्रशासन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और सांसद विजय बघेल की अनुशंसा के बावजूद तबादला आदेश में संशोधन नहीं होने की चर्चा, मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका पर भी सवाल
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी।
छत्तीसगढ़ में सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी अधिकारियों के स्थानांतरण एवं पदस्थापना आदेश को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। 16 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में विभिन्न अधिकारियों की वर्तमान पदस्थापना में संशोधन करते हुए नवीन पदस्थापना के निर्देश दिए गए हैं। इस आदेश के बाद राजनीतिक अनुशंसाओं, प्रशासनिक निर्णयों और जनप्रतिनिधियों की सिफारिशों को मिलने वाली तवज्जो को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
विभागीय सूत्रों के हवाले से यह चर्चा सामने आई है कि केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और दुर्ग सांसद विजय बघेल द्वारा अधिकारियों की पदस्थापना अथवा स्थानांतरण में संशोधन के संबंध में अनुशंसा पत्र दिए गए थे। आरोप है कि इन अनुशंसाओं के बावजूद संबंधित अधिकारियों के संशोधन आदेश जारी नहीं किए गए। सूत्रों का यह भी दावा है कि सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव अविनाश चम्पावत ने इन अनुशंसाओं को अपेक्षित महत्व नहीं दिया। हालांकि, अनुशंसा पत्रों की वास्तविक स्थिति, उन पर हुई विभागीय कार्रवाई और निर्णय के कारणों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि संबंधित आदेश सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी किया गया है, जो राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों की पदस्थापना से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधियों की ओर से भेजे गए अनुशंसा पत्रों पर विचार नहीं किया गया, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन पत्रों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या रही और संबंधित पक्षों को क्या जवाब दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। चर्चा का प्रमुख विषय यह है कि क्या जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाओं पर मुख्यमंत्री सचिवालय स्तर पर विचार किया गया था और यदि किया गया, तो उसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने क्या निर्णय लिया? क्या अनुशंसाएं विभाग तक पहुंचीं, क्या उनका परीक्षण हुआ और क्या संबंधित अधिकारियों के मामलों में कोई प्रशासनिक बाध्यता थी? इन सवालों का जवाब सामने आने पर ही पूरे प्रकरण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों की पदस्थापना शासन के अधिकार क्षेत्र का विषय है। जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाएं अपने आप में बाध्यकारी आदेश नहीं होतीं, लेकिन यदि किसी मामले में अनुशंसा प्राप्त होती है, तो उस पर नियमानुसार विचार हुआ या नहीं, यह जानना महत्वपूर्ण है। खासकर तब, जब अनुशंसा करने वालों में केंद्रीय राज्य मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और सांसद जैसे संवैधानिक एवं जनप्रतिनिधि पदों पर आसीन लोग शामिल हों।
फिलहाल, 16 अक्टूबर को जारी पदस्थापना आदेश और कथित अनुशंसा पत्रों के बीच संबंध को लेकर कई सवाल अनुत्तरित हैं। सामान्य प्रशासन विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित अनुशंसाओं पर क्या कार्रवाई हुई और संशोधन आदेश जारी नहीं होने के पीछे क्या कारण रहे।
अब निगाहें सामान्य प्रशासन विभाग और मुख्यमंत्री सचिवालय के आधिकारिक स्पष्टीकरण पर हैं। यदि अनुशंसा पत्र प्राप्त हुए थे, तो उन पर हुई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक होने से प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिल सकता है।
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