खत्म हो रहे प्राकृतिक जंगल, वन संरचना में आ रहा बदलाव

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बिलासपुर- नमी संरक्षण की क्षमता तेजी से कम हो रही है छत्तीसगढ़ की खेतीहर भूमि में। वर्षा चक्र में आ रहा बदलाव चिंता बढ़ा रहा है। यह दोनों मिलकर कार्बन संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की वन संरचना में आ रहा बदलाव वानिकी वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहा है। यह नया परिवर्तन कार्बन संतुलन और जलवायु स्थिरता को खतरे में डाल रहा है। प्रारंभिक जांच में पुराने जंगलों का तेजी से खत्म होने को जिम्मेदार माना जा रहा है।

इसलिए पुराने वन अहम

प्रदेश के पुराने साल वन नमी संरक्षण और वर्षा चक्र बनाए रखते हैं। साल का एक परिपक्व पेड़ अपने जीवऩ काल में 200 से 300 टन कार्बन संचित कर सकता है। सामाजिक महत्व पुराने वनों का इसलिए भी जाना जा सकता है क्योंकि तेंदू, महुआ, चिरौंजी और इमली ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है। इसके अलावा पुराने वन, आदिवासी समाज को धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से जोड़े रखते हैं।

विविधता से परे नए युवा वन

नए वन में बांस और साल के युवा पौधे ज्यादा नजर आ रहे हैं। यह प्रजातियां कार्बन डाइऑक्साइड को तेजी से अवशोषित करती हैं। कार्बन संग्रहण की कमजोर क्षमता दीर्घकालिक स्थिरता को प्रभावित कर रही है। जैव विविधता इसलिए चिंता बढ़ाने वाली मानी जा रही क्योंकि युवा वनों में भालू, बाघ और जंगली भैंस के साथ औषधिय पौधे सुरक्षित नहीं होते।

चिंता इसलिए

पुराने वनों का क्षरण और नए वनों की वृद्धि वानिकी वैज्ञानिकों को इसलिए चिंता में डाल रही है क्योंकि यह स्थितियां कार्बन भंडार को प्रभावित कर रहीं हैं। इसलिए पुराने वनों का संरक्षण ‘कार्बन हॉटस्पॉट’ मानकर संरक्षित करना होगा। खनन क्षेत्र में दीर्घकालिक कार्बन भंडारण करने वाली मिश्रित प्रजातियों के पौधों का रोपण करना होगा। बांस के जंगल पर सख्त नजर रखनी होगी क्योंकि अब यह प्रजातियां ग्रामीणों की आजीविका और कार्बन क्रेडिट को बढ़ाती है।

पुराने वनों का कोई विकल्प नहीं

युवा वन अल्पकालिक कार्बन अवशोषण में सहायक हैं, परंतु पुराने वन स्थायी कार्बन बैंक और जैव विविधता के असली संरक्षक हैं। यदि छत्तीसगढ़ केवल युवा वनों पर निर्भर रहा तो नेट कार्बन हानि निश्चित है। इसलिए नीति यह होनी चाहिए कि पुराने वनों को संरक्षित किया जाए और युवा वनों का सतत प्रबंधन किया जाए, जिससे राज्य कार्बन संतुलन और जलवायु स्थिरता दोनों में आदर्श मॉडल बन सके।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री),
बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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