सबसे अधिक शिकार गरीब ठेला खोमचे वाले ही इनकी समस्या का समाधान पर कोई गंभीर नहीं : वोट बैंक के आड़ में कब्जे होते रहेंगे – सरकार बदलते ही मलबा हटाने पर लाखों रुपए खर्च

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भुवन वर्मा बिलासपुर 06 अप्रैल 2025

बिलासपुर। स्मार्टसिटी बनाने की नगर निगम की प्लानिंग में शहर में आतिक्रमण हटाने का काम सालों से चल रहा है। जिसकी सराहना कम जनता के मन में गुस्सा ज्यादा नजर आ रहा है। नगर निगम बिलासपुर इस समय आतिक्रमण की कार्यवाही भेदभाव तरीके से करती दिखाई देती है। भ्रष्ट बेईमान व्यापारियों उद्योगपतियों बेजा कब्जे में दुकान व कॉम्प्लेक्स बनाकर संचालित करने वाले उनको नहीं दिखता है ।सबसे अधिक शिकार ठेला खोमचे वाले ही होते दिखते हैं। हम आए दिन बड़े ट्रैक्टर में छोटे ठेला फल और तराजू अन्य समनो को  निगम द्वारा कब्जा करके ले जाते हुए देखे होंगे । प्रशासन या आम लोगों ने कभी महसूस किया क्या उस गरीब के घर चूल्हा जल भी पाएगी कि नहीं,,,,?

गरीब ठेले वालों का फल तराजू सहित जप्ती कर लेना और उन्हें ब्लैकमेल करना पूरे दिन भर की मेहनत कमाई सामान सब लूट लिया जाता है। कई बार उन्हें अपने ठेला तराजू और फल को वापस छुड़ाने के लिए घुस अलग देना पड़ता है । फिर भी सामान पूरा हाथ नहीं लगता है। कौन हड़प जाता है कहां जाता है यह आप भी समझ सकते है।

इधर निगम के अतिक्रमण निवारण दस्ते ने फलां-जगह से न कब्जे हटाए। अवैध निर्माण को तोड़ दिया। रास्ता घेर रहे ठेले-खोमचे वालों को हटाया भगाया ऐसे शीर्षक मीडिया में आमतौर पर छपते रहते हैं। क्या आपने कभी ऐसी हेडलाइन पढ़ी है, ‘अवैध कब्जे या निर्माण के लिए दोषी फलां इंजीनियर, फलां जोन कमिश्नर या फलां भवन शाखा अफसर सस्पेंड, मलबा हटाने में खर्च की गई राशि वसूलने के निर्देश, अवैध बस्ती बसाने वाले पार्षद या नेता पर एफआईआर।’ जवाब होगा- नहीं….।

छत्तीसगढ़ के लगभग सभी शहरों में अतिक्रमण बड़ी समस्या है। जैसे-जैसे आबादी और गाड़ियां बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे सड़कें सिकुड़कर गलियों में तब्दील हो रही हैं। यह भविष्य की बड़ी चुनौती भी है, क्योंकि जब-जब चौड़े रास्तों की जरूरत होगी, तब-तब कब्जे हटाने की बात आएगी। फिर राजनीति होगी नेता, विधायक, पार्षद आएंगे, विरोध में झंडे उठाएंगे। चुनाव का वक्त होगा तो कब्जे हटाने की मुहिम रोक दी जाएगी। चुनाव का वक्त न भी हो तो कुछ दिनों के लिए कार्रवाई नहीं की जाएगी। फिर जब दबाव बनेगा, तब कार्रवाई होगी। फिर व्यवस्थापन की बात आएगी। इसके बिना हटा देंगे तो फिर से कहीं कब्जा होगा।

सवाल यह है कि जब कब्जों की शुरुआत होती है, तब अफसरों की आंखों पर पट्टी क्यों बंध जाती है,,,,,,? रेवेन्यू का तमाम अमला, नगर निगम कमिश्नर समेत तमाम इंजीनियर, जोन कमिश्नर, भवन शाखा, अतिक्रमण निवारण दस्ता और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के अधिकारी आखिर किस नशे में होते हैं, जो तब उतरता है, जब हाई कोर्ट दखल दे। यह निकम्मापन सिर्फ उन इलाकों के लिए है, जहां किसी माननीय, महामहिम की गाड़ी नहीं फंसती या उनके घर की रौनक नहीं दबती या फिर किसी व्यापारी का बड़ा प्रोजेक्ट नहीं अटकता।

• ऊपर की सारी शर्तें यदि लागू हों तो पलक झपकते पूरा मैदान साफ कर दें और उन आंसुओं का भी मोल नहीं समझेंगे, जो गृहस्थी उजड़ते देखकर बहते रहें या उन्हें पोंछकर जितना सामान समेट सकते हैं, समेट लें। हो सकता है कि जिन्हें अभी निकम्मा मान रहे हैं, उनमें वे लोग भी शामिल हों, जो इन अवैध निर्माण से हफ्ता-महीना वसूल रहे हों। घर जाते हुए इनमें से किसी सब्जी या फल के ठेले से घर के लिए मुफ्त में कोई सामान ले जाते हों,,,,।

सरकारी दस्तावेजों में एक शब्द दर्ज है मास्टर प्लान। इस प्लान से शायद उन्हीं लोगों को सरोकार होता है, जो जमीन का कारोबार करते हैं। जब आप सारे दस्तावेजों के साथ पहुंचें तो हो सकता है कि मास्टर प्लान की कुछ शर्तें व कमियां गिनाकर पैसे ऐंठने का प्लान बाहर आ जाए, लेकिन जब इसी प्लान के विपरीत कोई निर्माण हो, तब जिम्मेदारों का अंधापन, गूंगापन और बहरापन जाग जाए। सिस्टम में बैठे हर जिम्मेदार की यह जवाबदेही है कि वे पहली झोपड़ी बनने से ही रोकें और उचित व्यवस्थापन करें। अन्यथा इसी तरह कब्जे होते रहेंगे और फिर मलबा हटाने पर लाखों रुपए खर्च होते जाएंगे।

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