12 ज्योतिर्लिंग की महिमा अपार, घर बैठे करें दर्शन; जानिए हर पीठ की मान्यता और महत्व
अगर आप भी सावन के महीने में घर बैठे 12 ज्योतिर्लिंग का दर्शन करना चाह रहे हैं, तो हरिभूमि.कॉम आपके लिए हर सोमवार तीन ज्योतिर्लिंग का दर्शन कराएगा। पिछले सोमवार हम आपको सोमनाथ, मल्लिकार्जुन और महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के महत्व और विशेषता के बारे में बताया गया था। आज हम आपको ओंकारेश्वर, केदारनाथ और भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के बारे में बता रहे हैं।
पहला ज्योतिर्लिंग – सोमनाथ
बारह ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ को पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। जो गुजरात के सौराष्ट्र में समुद्र किनारे स्थित है। इस तीर्थस्थान का उल्लेख श्रीमद्भागवत गीता, स्कंदपुराणम, शिवपुराणम आदि प्राचीन ग्रंथों में भी है। ऋग्वेद में भी सोमेश्वर महादेव की महिमा का उल्लेख किया गया है। सावन के महीनों में सोमवार के दिन सोमेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना करना काफी शुभ माना जाता है। इस दिन लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं।
क्या है मान्यता
सोमनाथ मंदिर की मान्यता है कि चंद्रदेव ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यहां तप किया था। चंद्रदेव की तपस्या से शिव जी प्रसन्न हुए और प्रकट होकर चंद्रदेव के एक नाम सोम पर ही इस मंदिर का नाम सोमनाथ रखा। इतिहासकारों के अनुसार इस ज्योतिर्लिंग पर आक्रमणकारियों ने 6 बार आक्रमण किया। इसके बाद भी इस मंदिर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
मंदिर की विशेषता
यह मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप तीन भागों में विभाजित है। जिसका 150 फुट ऊंचा शिखर है और शिखर पर दस टन का कलश स्थित है। इसकी ध्वजा 27 फुट ऊंची है। वहीं इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का पुनर्निर्माण महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था। इस मंदिर में लाखों की संख्या में श्रध्दालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
दूसरा ज्योतिर्लिंग- मल्लिकार्जुन
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंग मंदिर में दूसरे नंबर पर है। यह आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के किनारे श्रीशैल पर्वत बना हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर करीब 2 हजार वर्ष पुराना है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां देवी पार्वती के साथ शिव जी ज्योति रूप में विराजित हैं। सोमवार को मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में विशेष रूप से पूजा अर्चना किया गया।
मान्यता
इस मंदिर की मान्यता है कि यहां भगवान शिव स्वयं अमावस्या के दिन और माता पार्वती पूर्णिमा के दिन आती हैं। सावन के महीने में इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से कष्टों से मुक्ति मिलती है और सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसलिए इस मंदिर पर काफी संख्या में श्रध्दालु दर्शन के लिए आते हैं।
विशेषता
इतिहासकार बताते हैं कि आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व श्री विजयनगर के महाराजा कृष्णराय यहां पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने यहां पर एक सुन्दर मण्डप का भी निर्माण कराया था, जिसका शिखर सोने का बना हुआ था। उसके करीब डेढ़ सौ साल बाद महाराज शिवाजी मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए क्रौंच पर्वत पर पहुंचे। उन्होंने भी मन्दिर के पास ही एक उत्तम धर्मशाला बनवायी थी। मंदिर के पास ही कौंच पर्वत पर बहुत से शिवलिंग भी दर्शन के लिए मिलते हैं।
तीसरा ज्योतिर्लिंग – महाकालेश्वर
यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित है। एमपी की तीर्थनगरी उज्जैन में शिप्रा तट के निकट इस मंदिर का निर्माण 6ठी शताब्दी में कराया गया था। बता दें, मध्यप्रदेश में दो ज्योतिर्लिंग मंदिर है। उज्जैन के ज्योतिर्लिंग को बाबा महाकाल के नाम से जाना जाता है।
सावन में पहले सोमवार के मौके पर उज्जैन में बाबा महाकाल की पहली शाही सवारी निकली गई है। मान्यता है कि वर्षा काल में सृष्टि का संचालन करने वाले सभी देवता शयन काल में चले जाते हैं। जबकि बाबा महाकाल सृष्टि का संचालन करते हैं। सावन के महीने में महाकाल प्रजा का हाल जानने निकलते हैं। जानकारी के अनुसार सोमवार को करीब 2.30 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं।
मान्यता
मान्यता है कि विक्रमादित्य के शासन के बाद से यहां कोई भी राजा रात में नहीं रुक सकता। इतिहासकारों के मुताबिक जिसने भी यह दुस्साहस किया है, वह संकटों से घिरकर मारा गया। यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह मंदिर में भगवान की भस्म आरती की जाती है। पूजा और दर्शन करने से भय दूर होता है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हिंदू मंदिर है, जिसे शिव का सबसे पवित्र निवास माना जाता है।
विशेषता
इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर को इल्तुतमिश ने 1234-35 में आक्रमण के दौरान नष्ट कर दिया था। बाद में इसे मराठा दीवान, रामचंद्र बाबा सुकथांकर, रामचंद्र मल्हार द्वारा पुनर्निर्मित और पुनर्जीवित किया गया था। लेकिन बाद में 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद महाकालेश्वर देव स्थान ट्रस्ट को उज्जैन नगर निगम द्वारा चलाया जा रहा है।
चौथा ज्योतिर्लिंग- ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में स्थित है। इंदौर शहर से लगभग 80 किमी की दूरी पर खंडवा जिले की नर्मदा नदी के किनारे पर बना है। यह एकमात्र मंदिर है जो नर्मदा नदी के उत्तर दिशा में स्थित है। यहां पर आपको भगवान शिव नदी के दोनो तट पर दर्शन के लिए मिल जाएंगे। यहां पर महादेव को ममलेश्वर व अमलेश्वर के रूप में पूजा जाता है।
मान्यता: मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के सारे तीर्थदर्शन करने के बाद ओंकारेश्वर में तीर्थों का जल नहीं चढ़ाता तो, उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार जमुनाजी में 15 दिन का स्नान तथा गंगाजी में 7 दिन का स्नान करने पर जितना फल मिलता है, उतना पुण्यफल नर्मदाजी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
विशेषता: यह देश का एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां, तीनों प्रहर आरती की जाती है। मान्यता है कि तीनों समय में देवों के देव महादेव उपस्थित रहते हैं। यह परंपरा दैविक काल से चली आ रही है। मंदिर के पुजारियों के मुताबिक यहां रोजाना माता पार्वती संग शिवजी चौपड़ खेलने आते हैं। इसके बाद मंदिर के शयन कक्ष में विश्राम करते हैं। इस दौरान संध्या काल में देवों के देव महादेव तीनों लोकों का भ्रमण करने के बाद ओंकारेश्वर आते हैं।
पांचवा ज्योतिर्लिंग- केदारनाथ
केदारनाथ धाम चारो धामों में से एक है। यह उत्तराखंड में स्थित है। मंदिर की ऊंचाई करीब 3581 वर्ग मीटर है। जो रुद्रप्रयाग जिले में गौरीकुंड से करीब 15 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर हिमालय क्षेत्र में आने की वजह से यहां काफी ठंडी पड़ती है, इसलिए सर्दी के मौसम में यह बंद रहता है।
मान्यता: केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की मान्यता है कि यहां महाभारत के समय शिव जी ने पांडवों को बेल रूप में दर्शन दिया था। वहीं मदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं-9वीं सदी में करवाया था।
छठवां ज्योतिर्लिंग- भीमाशंकर
भीमशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का प्रसिद्ध मंदिर और तीर्थ स्थान है। जो महाराष्ट्र में पुणे से करीब 100 किमी. की दूरी पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का पुराणों में भी वर्णन मिलता है।
मान्यता: हिंदू धर्म के पुराणों में ऐसी मान्यता है कि जो भक्त इस मंदिर में प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद 12 ज्योतिर्लिगों का नाम का जाप करते हुए दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं। इसके अलावा उस व्यक्ति के स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।
विशेषता: भीमशंकर ज्योतिर्लिंग का शिवलिंग काफी मोटा होने की वजह से मोटेश्वर महादेव भी कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का शिखर नाना फड़नवीस द्वारा 18वीं सदी में बनवाया गया था। इसके अलावा महान मराठा शासक शिवाजी ने भी मंदिर की पूजा के लिए कई तरह की सुविधाएं प्रदान कराई थी। यहां पर बना एक बड़ा घंटा भीमशंकर की एक विशेषता को बतलाता है।
विशेषता: केदारनाथ मंदिर की सबसे बड़ी खास विशेषता यह है कि, साल में केवल 6 माह ही कपाट खुलते हैं और 6 माह मंदिर बंद रहता है। इसलिए यहां पर कपाट खुलने के बाद काफी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए आते हैं।
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