आत्माओं के लिए आदिवासी बनाते हैं छोटी छोटी झोपड़ियां बिंता में 600 वर्षों से जारी है यह आदिम परंपरा
जगदलपुर। आदिवासी समाज की अपनी अलग पहचान और मान्यताएं हैं। इसके चलते बस्तर की आदिवासी सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन बड़े स्तर पर वर्षों से हो रहा है। घाटी में बसे बिंता गांव में लगभग 600 साल पहले बसे आदिवासी आज भी अपने परिजनों की कब्रों के ऊपर छोटी सी झोपड़ी बनाते हैं। इनकी यहां मृतक की आत्मा निवास करती हैं।
लोग अपने मृत परिजन का दाह संस्कार करें या दफनाएं। दोनों ही परिस्थिति में लोग अपनी हैसियत के हिसाब से वहां समाधि बनवाते हैं। बिंता के ग्रामीणों ने बताया कि मृत परिजन को पितर में शामिल करना हमारी परंपरा है, इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार उनके लिए झोपड़ी बना मृत आत्मा का निवास स्थान तय करते हैं।
जिला मुख्यालय से लगभग 70 किमी दूर बिंता घाटी में छह सौ साल पहले पापड़ाहांडी ओड़िशा के 360 आरण्यक ब्राह्मण परिवारों को बसाया गया था। उसे काल में ही उनके सहयोगियों के रूप में आदिवासी और रावत समाज के लोग भी बिंता में बसे और अपनी परंपराओं का लगातार निर्वहन करते आ रहे हैं।
बिंता बाजार के पास एक मरघट है। इस मरघट से गुजरते समय आगंतुक अचानक रूप का छोटी-छोटी झोपड़ियां को देखते हैं। दरअसल यह आदिम समाज की कब्रें हैं। यहां के हिंछाराम ठाकुर ने बताया कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है। तब आदिवासी समाज मृत आत्मा को अपने पितरों में शामिल कर लेता हैं। आदिवासी समाज पुनर्जन्म को मानता है। इसके चलते ही आत्मा के निवास के रूप में छोटे-छोटे झोपड़ियां बनाता है।बिंता मरघट में यह झोपड़ियां आत्माओं का घर है। झोपड़ी बनाने की यह परंपरा अब बस्तर के कुछ एक गांव में ही नज़र आती हैं
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