सरकारी मिशनरी के इच्छा शक्ति व संस्कार के अभाव में होती है यौन संबंधी अपराध – डी आई जी छत्तीसगढ़

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भुवन वर्मा, बिलासपुर 2 दिसंबर 2019

हैदराबाद में महिला डाक्टर के साथ, रांची मे कानून की पढाई करने वाली लड़की के साथ दुष्कर्म की घटना शर्मनाक व निन्दनीय हैं। देश के उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, रांची हर कोने से प्रतिदिन ऐसी हैवानियत और दिल दहलाने वाली,देश को शर्मसार करने वाली घटनाओं के बारे में सुनकर रूह कांप उठती हैं।आज उसके साथ तो कल किसके साथ हो जाएगी ऐसा सोचकर ही मन दुखी व उदास हो जाता है।देश मे इतने मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे बने है,कोई भी खाली नहीं है,दर्शन के लिए वीआईपी कोटे का सहारा लेकर भी प्रवेश इतना आसान नहीं है।टीवी पर भी संस्कारी चैनलों की भरमार है,हर शहर मे बाबाओं के बड़े बड़े आश्रम बने हुए है,हर दिन लोगों को उधर जाते हुए देख सकते है।

सदियों से हम महानता का दावा करते रहे है।फिर भी देश के हर कोने से हमारी बहन बेटियों के साथ ऐसे जघन्य अपराध घटित होने के बारे मे खबरे सोशल मीडिया के माध्यम से आती रहती है।विचारणीय यह है कि एक उच्च आदर्शों वाले ,संस्कारित देश मे यह घटनाएं क्यों घटित हो रही हैं।निर्भया के साथ हुई घटना के बाद तो कानून भी कठोर बना दिए गए है,अपराधियों को सजाएं भी मिल रही है ,फिर भी ऐसी घटनाओं में कमी नहीं आ रही है ।हम सबको इस पर चिन्तन मनन करना होगा।किसी भी बिमारी का स्थायी इलाज तब तक नहीं हो सकता जब तक बिमारी का कारण नहीं समझ लिया जाता।हमको यह पता करना होगा कि इन हैवानों मे बहन बेटियों के प्रति इतनी नफरत क्यों है।क्यों भेड़ियों की तरह टूट पड़ते है,क्यों अपना विवेक पर नियंत्रण कर नहीं पाते।

बलात्कार का एक कारण सामाजिक दबावों की अनुपस्थिति है।अपराधियों को यह भय नहीं होता है कि उनका परिवार और समाज उनका बहिष्कार कर देगा।सामंती समाज में लड़के द्वारा किया गया बलात्कार को क्षम्य माना जाता है।बड़े शहरों में बलात्कार उन लोगो द्वारा किया जाता है जो दूसरे क्षेत्र(बाहर) से आएं है और अपने समाज के दबावों से तात्कालिक तौर पर मुक्त है। जातिवादी या साम्प्रदायिक दमन के समय यही अपराध प्रशंसा का कारण बन जाता है। कानून का भय की अनुपस्थिति भी ऐसे अपराध का कारण है। पीड़ित पर बचाव पक्ष यह साबित करने का प्रयास करता है कि यौन संबंध मे लड़की की सहमति थी।

सरकारी मशीनरी की इच्छा शक्ति की कमी भी आरोपियों को सजा नहीं दिलवा पाती है। अधिकांश मामलों में आरोपी जमानत पर छूटकर बाहर घूमते हैं और शिकायत करने वाली महिला हमेशा दूसरी दुर्घटना के भय मे जीती हैं।कानूनी प्रक्रिया भी लंबी है।उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और अनत मे राष्ट्रपति तक गुहार लगाई जाकर सजा को टलवाने मे सफल हो जाते है। मोबाइल और सस्ते डाटा ने युवाओं को गलत दिशा में मोड़ दिया है ।बिना रोक टोक के अश्लील विडिओ की उपलब्धता ने भी ऐसे अपराधों को बढ़ाने का काम किया है। समाज मे आसानी से उपलब्ध शराब व नशा का सामान भी ऐसे अपराधो के लिए एक कारण बनता है।

*कैसे रोके* आपराधिक घटनाओं पर रोक लगाना, अपराध घटित होने से अपराधियों को पकड़कर न्यायालय से सजा दिलाना पुलिस का पहला दायित्व है। लेकिन सामान्य जनों के सहयोग के बिना यह बिल्कुल ही असंभव है।पुलिस को यह प्रयास करना चाहिए कि आम लोगों का विश्वास अर्जित करके समाज में व्यवस्था कायम करने व अपराधियों को पकड़ने मे सहयोग लें साथ ही लोगों को भी अपना दायित्व निभाना चाहिए।यौंन संबंधित अपराध तो बिना समाज के सहयोग के रोकना बहुत ही मुश्किल काम है।ऐसे अपराधों को कानून के साथ साथ परिवार में बच्चों को अच्छे संस्कार देकर ही रोका जा सकता है। यौन अपराधों पर नियंत्रण के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति से ज्यादा सामाजिक इच्छाशक्ति की बड़ी भूमिका है। आत्म रक्षा का बुनियादी प्रशिक्षण उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा हो ताकि वो साफ्ट टारगेट न हो।आत्मरक्षा के लिए मिर्च सप्रे ,सेफ्टीपिन आदि साथ रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। स्कूलों व मिडिया द्वारा माता पिता को बताया जाना चाहिए कि बच्चों को कैसे बचाया जा सकता है।बच्चों को गूड टच व बैड टच की जानकारी देनी होगी। स्कूलों व कालेजों मे अनुशासन व शिक्षकों का चरित्र भी काफी महत्वपूर्ण है। जैसा बोवोगे ,वैसा ही काटोगे । दुर्भाग्यजनक है कि हमारे समाज में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों मे देशवासियों की प्रतिक्रिया पिड़ित की जाति,वर्ग व धर्म को देखकर की जाने की प्रवृति अपराधियों का हौंसला बढ़ाने का काम करती हैं।सामाजिक संगठनों को इस मनोवृत्ति को त्यागना पड़ेगा।सबसे ज्यादा शर्म की बात तो यह है कि लोग अपराधी की जाति ,धर्म व राजनीतिक प्रतिबध्दता को देखकर अपनी प्रतिक्रिया देते है,न कि अपराध की गंभीरता व पिड़ित की मनोवृत्ति के अनुसार । अगर समाज ऐसे अपराध को अत्यंत घृणित कार्य के रूप में देखें और अपराधी का समाज से एक प्रकार से बहिष्कार कर दे तो अधिकांश लोग ऐसी हिम्मत नहीं कर सकेंगे।कानून से लड़ना आसान है,अपने समाज से लडऩे की ताकत बहुत कम लोगों में होती है। महिलाओं को रोजगार परक शिक्षा मिले ताकि वो धीरे धीरे दूसरों पर निर्भरता कम हो सके।उनको महिलाओं के अधिकारों की जानकारी देना होगा। बलात्कार को भी दुर्घटना की तरह देखने की जरूरत है।जैसे सड़क दुर्घटना मे घायल व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखते हैं वैसे ही बलात्कार पीड़ित के प्रति भी संवेदना का भाव होना चाहिए,उसे जिन्दगी भर अपमानित नहीं किया जाना चाहिए।अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। लड़को को घरों के काम मे सहभागी बनाया जाना चाहिए।परवरिश के दौरान लड़का लड़की मे भेद नहीं रखना चाहिए।लिंग भेद को प्रोत्साहित करने वाले धार्मिक विश्वासों की समीक्षा करनी होगी। जब तक समाज एक ही प्रकार की अपराधिक घटना पर दोहरा मापदंड अपनाता रहेगा तब तक ऐसे अपराधों पर रोका जाना असंभव है।सिनेमा हाल में बैठकर फूलन देवी के साथ होने वाले बलात्कार पर ताली बजाते रहेंगे और दूसरी ऐसी ही घटना पर कैंडल जलाएंगे तो यह मानकर चलिए कि अपराधों को रोका नहीं जा सकता।

हर पीढी पहले वाली पीढी से संस्कार प्राप्त करती है।जैसे संस्कार हम अपने युवा पीढी को देंगें वैसे ही वो बर्ताव करेंगे।माता पिता को अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने पड़ेंगे।किसी जाति,धर्म के प्रति नफरत,हिंसा से अपने बच्चों को दूर रहकर हर व्यक्ति के साथ अपने परिवार का सदस्य समझकर ही बर्ताव करने की शिक्षा देनी होगी। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध मे पीड़ित को जाति, धर्म ,वर्ग और राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करना होगा।सबको यह दर्द एक जैसा होना चाहिए चाहे यह घटना निर्भया के साथ हो चाहे डेल्टा के साथ चाहे प्रियंका के साथ।ऐसे दुष्कर्म का आरोपी चाहे मंत्री हो,न्यायाधीश हो,अधिकारी हो या सामान्य व्यक्ति एक ही नजर से देखा जाना चाहिए ।आरोपी का पद नहीं उसका अपराध देखना होगा। परिवार राष्ट्र की बेसिक ईकाई है।यानि नींव हैं।नींव मजबूत होगी तो भवन टिका रहेगा। परिवार की पाठशाला मे ही संस्कारों की शिक्षा मिलती हैं।

संतान के जन्म के बाद पालन पोषण के साथ चरित्र निर्माण करना भी अभिभावकों का ही कर्तव्य है।यदि ठीक से नहीं निभाया तो बच्चे अनेकों दुर्गुणों से घिर जाते है और अपने लिए, परिवार के लिए तथा समाज के लिए अभिशाप सिध्द होते हैं।बच्चों की संगति किनके साथ है, देखना होगा।बच्चों का शिक्षण उपदेशों पर नहीं अनुकरण पर निर्भर करता है।घर का वातावरण बहुत ही निर्मल ,शांतिमय, सदाचारी एवम् सज्जनता हो जिससे बच्चों को सद्गुणों को गृहण करने की प्रेरणा मिले। बच्चों की शिक्षा घर से ही शुरू होती हैं।उनके पालन पोषण की जिम्मेदारी माता पिता को मिल कर निभानी चाहिए, बच्चों के साथ संबंध गहरा बनाए, बातचीत का मार्ग हमेशा खुला रखें, उनको जिम्मेदारी की भावना से अवगत कराएं | आरोपी की मां ने कहा, जैसा उन्होंने किया, वैसे ही जिंदा जला दो” इतना कहने मात्र से काम नहीं चलेगा ,माता पिता को भी बच्चों के अच्छे बुरे की जिम्मेदारी लेनी होगी।उनके पालन पोषण में जो लापरवाही बरती गई हैं,जिसके कारण एक होनहार युवा अपनी जान खो चूकी है,परिवार, देश शोक मे डूबा हुआ है।जिस परिवार मे बेटियां हैं उनकी चिन्ताएं बढ़ा दी है । पारिवारिक संस्कार ही यौन संबंधित अपराधों से बचा सकते है।

कुछ सीमा तक ऐसे अपराधों मे परिवार की भी जिम्मेदारी निर्धारित करनी चाहिए।अपने सदस्यों को ऐसे अपराध करने के रोकने के लिए ऐसा करना ही चाहिए।जिससे माता पिता बच्चों की खोज खबर लेते रहेंगे। परिवार मजबूत तो समाज मजबूत, देश मजबूत।

डीआईजी, छत्तीसगढ़

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