गर्व करें अपने पर्व पर-सम्पूर्ण विश्व एक विचित्र किस्म के वैचारिक प्रदूषण मे जी रहा : तब लगता है कि क्या इस पर किसी का नियंत्रण ही नहीं
आलेख – गोपाल वर्मा वरिष्ठ साहित्यकार चिंतक समीक्षक तिल्दा रायपुर
तिल्दा। पिछले कुछ वर्षों से बहुत कुछ हो रहा है यहाँ।यहाँ से तात्पर्य सिर्फ भारत मे नहीं किंतु सम्पूर्ण विश्व एक विचित्र किस्म के वैचारिक प्रदूषण मे जी रहा लगता है।तब लगता है कि क्या इस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है ? क्या सब कुछ युग प्रवाह के अनुसार प्रवाहित हो रहा है।विश्व के सभी प्रबुद्धजन चिंतित और विस्मित हैं ।हर देश अपना वर्चस्व और आर्थिक स्थिति मजबूत करने अन्य देशों के स्वायत्तता पर अतिक्रमण करने मे लगा है।महावीर स्वामी और बुद्ध ने विश्व को जो” जियो और जीने दो ” का रास्ता सुझाया है, यह तो हम भूल ही चुके हैं।सभी अपने पंथ और संप्रदाय को श्रेष्ठ साबित करने के होड़ मे लगे हुए हैं।शाश्वत सत्य को स्वीकार करने तो दूर इस पर कोई सुनने तक को तैय्यार नहीं।अपने देश अपनी संस्कृति की बात करें तोअपने पर्व, रीति- रिवाज, परम्पराओं को हम स्वयं विस्मृत करते जा रहे हैं।
क्या हमें इस पर, अपने पूर्वजों के द्वारा स्थापित मानबिंदुओं पर तनिक भी गर्व की अनुभूति नहीं होती ? भारत तो पर्वों का ही देश है।और यह जो पावन मास चल रहा है, यह तो आत्मसंयम, कुटुम्ब प्रबोधन और सामाजिक सद्भाव का पर्व है, जो समाज और राष्ट्र को एकजुट रखता है। अपने पूर्वज पर्व या उत्सव को जीवन का एक अभिन्न अंग मानते थे।इसीलिए उनके जीवन से असंतोष, अशांति, तनाव और मनोविकृतियाँ कोसों दूर थे।
इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के मत मे ” जो राष्ट्र अपने जड़ों से कटे, दुनियां के नक्शों से वे मिट गये।जैसे किसी पेड़ के जड़ काट दिये जायें तो पेड़ सूख जाता है, मर जाता है।ऐसे ही स्वसंस्कृति, स्वभाषा, स्ववेषभूषा, स्वदेशी ये उस राष्ट्र और वहां के समाज को मजबूती से बाँधे रखता है।वही राष्ट्र और वहाँ के लोग चिरकाल तक सशक्त, समृद्ध, शाँतिमय जीवन जीते हैं।विचार करें शाँति, सद्भाव और समरसता के वाहक इन पर्वों को हम कितने विकृत कर चुके हैं।
ऐसे में देश विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी क्या हम समरस जीवन जी पायेंगे ? इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति वालों के अतिरिक्त एक नागरिक के नाते क्या हमारी कोई भूमिका नहीं ? ये पर्व ही हैं जो अलग अलग क्षेत्र, विभिन्न समुदाय, भिन्न बोलियां, भिन्न भूषा को भी एक सूत्र मे बाँधने का कार्य करती हैं।विभिन्नताओं मे एक रहने का मंत्र यहीं से होकर जाता है।ये छोटी छोटी चीजें पुस्तकों मे, इतिहास में न भी लिखी गई हो तो भी अपने रक्त मे समाया ही है।ये परम्पराओं से चलती आती हैं, किसी को सिखाना नहीं पड़ता, पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से अब तक चलती आ रही है, चलती रहेगी।इसे भाषण या प्रवचन से नहीं सिखाया जा सकता, बड़ों को देखकर उनका अनुकरण नयी पीढ़ी स्वयं करती है।पर खेद इस बात का है कि हम बड़े ही इन परम्पराओं पर गर्व की अनुभूति करना भूल चुके हैं।
हम ही स्वदेशी रहन सहन, वेषभूषा, भाषा, आहार, और मर्यादाओं का परित्याग कर देंगे तो बच्चों से तो अपेक्षा नहीं कर सकते न ? पर्व से ही पनपते हैं सुविचार, एक रहता है परिवार, इसी का ही तो बृहत रुप है संसार।और फिर हमारे पर्व से तो जुड़े हैं, प्रकृति, पेड़, पक्षी, पहाड़, प्राणी, पानी, पावक और पवन।इन सबके संरक्षण का संदेश पर्व ही देते हैं।हम इन सबको पूजते हैं।तो जिनके प्रति हृदय में आस्था है, श्रद्धा है उसे हम नुक्सान भला कैसे पहुंचा सकते हैं।और यही पर्व के उद्देश्य होते हैं।जब जब हम इनसे दूर हुये, प्रकृति से कटे, तब तब प्रलय, महामारी, विभीषिकाएँ आयीं।अभिप्राय यही कि सभी अपनी-अपनी मान्यताओं, मानबिंदुओं, प्रतिमानों और पर्वों पर गर्व करें।
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