छत्तीसगढ़ के रामनामी : मंदिर प्रवेश पर रोक- समुदाय ने विरोध स्वरूप पूरे शरीर में राम राम गोदवाये
भुवन वर्मा बिलासपुर 04 अप्रैल 2025
रायपुर। एक दलित जवनहा छोकरा ल मंदिर म नइ जावन दिस त वो ह वोकर विरोध स्वरूप अपन देंह म राम राम गोदवा डारिस अउ आगू चल के एक नवा संप्रदाय के स्थापना घलो कर डारिस, जेला आज हम सब ‘रामनामी संप्रदाय’ के रूप म जानथन.
ए ह बछर 1890 के आसपास के बात आय. जिला जाँजगीर-चॉंपा के गाँव चारपारा के जवनहा परशुराम ल दलित समाज के होय के सेती मंदिर म जावन नइ दे रिहिन हें, त वो ह एकर विरोध म अपन पूरा देंह भर राम राम गोदवा लिस, अउ निर्गुण उपासना के रद्दा म भक्ति मार्ग के नवा रद्दा बना दिस. वोकर कहना रिहिस के परमात्मा ल पाए बर न कोनो मंदिर जाए के जरूरत हे अउ न ही उहाँ बइठ के पूजा करे के जरूरत हे.
ए रामनामी समाज के मन कतकों पइत रायपुर आवत रहिथें. अइसने एक बेरा इहाँ के मुख्यमंत्री निवास म मोर एकर मन संग भेंट होए रिहिसे त उँकर संग मुँहाचाही होए रिहिसे. वोमा के एक सियान ह कहे रिहिसे- ‘आज लोगन हमन ल रामनामी के रूप म भगवान राम के उपासक बताए के प्रयास करथें, फेर हमन अयोध्या वाले राजा दशरथ के बेटा राम के नहीं, भलुक सर्वव्यापी निराकार ब्रह्म ल राम के रूप म मानथन अउ वोकरे उपासना करथन.
रामनामी समाज के लोगन के बिहनिया सूत के उठे ले लेके रतिहा सोवा के परत ले पूरा बेरा राम के जाप अउ सुमरनी म ही बीतथे. ए मन निर्गुण ब्रम्ह के उपासना करथें तेकर सेती न तो कोनो मंदिर जावयँ अउ न कानो मूर्ति के पूजा करयँ. फेर हाँ.. पूजा के बेरा इन एक लकड़ी के खंभा गड़ियाथें. सरी अंग म राम राम तो गोदवाएच रहिथें, इँकर कपड़ा-लत्ता अउ घर के कोठ मन म तको राम राम लिखाय रहिथे.
निर्गुण उपासना के कतकों संप्रदाय म लंबा चोंगा गढ़न के कुर्ता या सलूखा पहिने के परंपरा दिखथे, ठउका अइसनेच इहू मन पॉंव के घुठुवा तक लामे कपड़ा पहिरथें. पॉंव म घुँघरू बाँधथें अउ मुड़ म मंजूर पॉंखी के मुकुट पहिरथें. ए रामनामी समाज वाले मन के जीविका के मुख्य साधन खेती-किसानी ही आय. अब तो इँकर मन के संख्या पहिली ले थोकिन कम जनाथे, फेर बछर 1920 के आसपास जब एकर संस्थापक परशुराम ह देंह त्याग करिस वो बखत इँकर संख्या 20,000 अकन रिहिसे.
अब तो रामनामी समाज के उपासक मनला देश के कतकों जगा के आध्यात्मिक अउ सांस्कृतिक आयोजन म घलो बलाए जाथे, जिहाँ ए मन अपन निर्गुण भक्ति मार्ग के अंतर्गत प्रस्तुति देथें. ए मन भले अपन आप ल अयोध्या वाले भगवान राम के उपासक नोहन कहिथें, फेर एमा के कतकों लोगन आजकल गोस्वामी तुलसी दास के सिरजाय अमर ग्रंथ राम चरित मानस के पाठ घलो करथें, जे ह एकर मन के निर्गुन ब्रम्ह के उपासना के बात म विरोधाभास कस जनाथे.
कतकों लोगन रामनामी मनला कबीर पंथ या सतनाम पंथ आदि ले जोड़े के प्रयास करथें, फेर ए ह सही नइ जनावय. जइसे इँकर जुड़ाव अयोध्या वाले राम संग नइए ठउका वइसनेच कबीर या सतनाम वाले निर्गुण उपासना संग घलो नइए. ए मन एक स्वतंत्र उपासना मार्ग के अनुयायी आयँ, जिंकर अब तो स्वतंत्र चिन्हारी घलो बनगे हवय. रामनामी समाज वाले मन हर बछर एक जबर मेला के आयोजन करथें, जेमा सबो रामनामी जुरियाथें. ए मेला के अवसर म जे मन रामनामी उपासना के भक्ति मार्ग म आना चाहथें, वो मनला दीक्षा दिए जाथे.
आलेख-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
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